How could the armed mobs, out on the roads to retaliate the killings of VHP activists, track down Muslim business establishments throughout the state in a matter of hours?
The VHP leader Pravin Togadia's disclosure in an interview he had given me for the Calcutta daily, The Telegraph, on January 10, 1992, flashed through my mind. Togadia had boasted that the VHP had undertaken a census and land record survey to take stock of the real estate ownership pattern among Hindus and Muslims in over 18,000 villages, towns and cities of the state.
The survey, he said, would provide the VHP leadership with the necessary data that would help formulate short-term and long-term strategies for 'protecting' the interests of the Hindu community in 'sensitive' areas.
The survey, he said, would help the VHP draw up a 'boundary' line in all the major towns and cities beyond which the Muslims would not be allowed to expand. "We will establish border check posts manned by Bajrang Dal volunteers to instill a sense of security among the Hindus," he had disclosed in the interview.
The large-scale rioting that occurred in the run up to the demolition of the Babri mosque in Ayodhya on December 6, 1992 and thereafter witnessed how property owned by the Muslims were mde target by arsonists and plundering mobs.
By drawing up a boundary line, the VHP is trying to create a 'Hindustan' and a 'Pakistan' in almost all the villages and towns of Gujarat, the birthplace of Mahatma Gandhi who lived and died for love, peace and non-violence.
The VHP has put up signboards at the entry points of all major towns in the state welcoming visitors to 'Hindurashtra's such and such town.' The unstated message in these signboards is louder: The country belongs only to the Hindus; all others have place in it.
(Part I)
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Wednesday, November 21, 2007
Saturday, September 09, 2006
ऐसे बिकते हैं केसरिया पेडे
(यह लेख १९९९ में उस समय लिखा गया था जब पोप की भारत यात्रा पर संघ परिवार ने देश भर में भारी उहापोह मचाई थी)
नागपुर स्थित संघ मुख्यालय के फोन की घंटी सुबह तीन बजे बज उठी. गुरूजी ने झुंझलाकर फोन उठाया और भर्राई आवाज में गुर्राए, "कौन बदतमीज है?"
"क्षमा प्रार्थी हूं गुरुजी. मैं दिल्ली से गोविंद बोल रहा हूं. मामला इतना संगीन है कि इतनी देर रात को आपको कष्ट दे रहा हूं," सामने से घिघियाता हुआ जवाब मिला.
"जल्दी बको, इतना सुंदर सपना देख रहा था, सारा गुड गोबर कर दिया. कहे देता हूं कि यदि फालतू बात के लिए तुमने फोन किया है तो तुम्हें वापस नागालैंड भेज दूंगा. दिल्ली की बहुत हवा खा ली तुमने," गुरुजी गुर्राए.
"गुरुजी, आप तो मुझे तब से जानते हैं जब मुझे ठीक से निक्कर पहनना भी नहीं आता था. मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा जो बेवजह आपकी नींद खराब करने की हिमाकत करूं. बात यह है कि हमारे जासूसों ने खबर दी है कि वेटिकन के धर्मगुरू ने भारत आने की टिकट कटा ली है. हमारी गीदड भभकियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ. अब यदि यह फिरंगी गुरु यहां आता है तो अपनी दुकानदारी का क्या होगा?" गोविंद गिडगिडाते हुए बोला.
"अरे मूरख, तुम्हें भाजपा में क्या भेज दिया, तुम्हारी अकल घास चरने चली गई. शाखा में दी गई शिक्षा भूल गए? हमारी दुकानदारी की सबसे बडी खूबी यही है कि वह प्रतियोगी के बिना नहीं चलती. हमारा केसरिया पेडा तभी बिकेगा जब भोले-भाले ग्राहकों को हम यह बताएंगे कि पडोस के हलवाई की हरी बर्फ़ी में गाय की चर्बी मिली है और इटालियन पिज्जा में सूअर का गोश्त," गुरुजी ने जम्हाई लेते हुए कहा.
"लेकिन गुरुजी, अपने यहां करोडों ऐसे लोग हैं जो सब्जियां महंगी होने के कारण हमारी तरह शुद्ध शाकाहारी नहीं बन पाए हैं. वे तो इन बातों से भुलावे में नहीं आने वाले," गोविंद झिझकते हुए बोला.
'रहोगे तुम निपट मूरख ही. सयाने होते तो अब तक नागपुर मुख्यालय में प्रबंध संघ चालक बन गए होते और मेरी तरह आराम से शुद्ध गाय के शुद्ध दूध से बने पेडे खाते. देश भर के करोडों निक्कर धारियों से गुरु-दक्षिणा वसूल करते, सो अलग," गुरुजी ने गोविंद को फटकार लगाई.
"क्षमा करें प्रभो. दिल्ली में प्रतिदिन प्रेस कोन्फ़्रेन्स संबोधित करने के कारण मेरी मति मारी गई है. मेरी जड हो चुकी बुद्धि में आपकी बात ठीक से नहीं घुस पा रही है. केसरिया पेडे की बिक्री से हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्ज का क्या लेना-देना? महेरबानी कर मुझ गंवार को थोडा ग्यान दें," गोविंद लज्जित होने की मुद्रा में बोला.
"तो सुनो और मैं जो कहता हूं उसे अपनी सिंगापुर से स्मगल की हुई डिजिटल डायरी में नोट कर लो. लगता है तुम्हें अब स्वर्गीय श्री गुरु गोलमालकरजी महाराज के १००१ ब्रह्मवाक्यों की कम्पैक्ट डिस्क देनी ही पडेगी ताकि आगे अपने धंधे के मूलभूत सिद्धांतो को तो न ही भूलो," गुरुजी ने गोविंद को फिर एक बार फटकार लगाई.
"गुरुजी, एक मिनट, मैं फोन से लगा टेप रेकार्डर ओन कर लूं. हां, अब ठीक है, आप के हर सूत्र वाक्यों को मैं रेकार्ड कर रहा हूं ताकि इसे हर रोज सुबह, ध्वज वंदन के समय सुन सकूं," गोविंद ने विनीत स्वर में कहा.
गुरुजी ने खंखार कर गला साफ़ किया, पास पडे तांबे के लोटे में रखा केसर-मिश्रित दूध का एक घूंट भरा, और बोलने लगे:
"हम जिस केसरिया पेडे की लोगों में आदत लगाना चाहते हैं उसकी खासियत यह है कि उसे लोग तभी मजबूरी में खाते हैं जब उनमें दूसरे व्यंजनों के प्रति भय पैदा किया जाए. हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा बेचने वाले भी यही करते हैं. सबकी दुकानदारी एक-दूसरे के माल के प्रति लोगों में आशंका उत्पन्न करने से ही चलती है. यदि बाजार में हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा न हों, तो केसरिया पेडा कोई नहीं खरीदेगा."
"केसरिया पेडे ही क्या, सभी रंगों की मिठाइयों की मार्केटिंग की रणनीति का यह एक मात्र शास्वत मंत्र है. अब तुम वह टेप रिकार्डर बंद कर दो तो तुम्हें अति गोपनीय बात बताता हूं जिसे सिर्फ़ देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान पंडितजी एवं खूफ़िया विभाग का संचालन करने वाले मालपानीजी ही जानते हैं," गुरुजी ने फोन के माउथपीस को धोती में लपेट कर फुसफुसाते हुए कहा.
जब वे इस बात से आश्वस्त हो गए कि गोविंद ने टेप रेकार्डर बंद कर दिया है तो गुरुजी बोले, "वेटिकन के धर्मगुरु को यहां आने का निमंत्रण मैंने ही दिया था. ताकि वे आएं और इटालियन पिज्जा की खूब जोर-शोर से मार्केटिंग करें. हमारी वानर सेना तो तैयार ही बैठी है कि कब पिज्जा का कैम्पेन शुरु हो कि उसके खिलाफ़ प्रचार अभियान प्रारंभ करें. वैसे भी त्योहारों का मौसम चल रहा है. अपने केसरिया पेडे होट केक की तरह बिक जाएंगे."
नागपुर स्थित संघ मुख्यालय के फोन की घंटी सुबह तीन बजे बज उठी. गुरूजी ने झुंझलाकर फोन उठाया और भर्राई आवाज में गुर्राए, "कौन बदतमीज है?"
"क्षमा प्रार्थी हूं गुरुजी. मैं दिल्ली से गोविंद बोल रहा हूं. मामला इतना संगीन है कि इतनी देर रात को आपको कष्ट दे रहा हूं," सामने से घिघियाता हुआ जवाब मिला.
"जल्दी बको, इतना सुंदर सपना देख रहा था, सारा गुड गोबर कर दिया. कहे देता हूं कि यदि फालतू बात के लिए तुमने फोन किया है तो तुम्हें वापस नागालैंड भेज दूंगा. दिल्ली की बहुत हवा खा ली तुमने," गुरुजी गुर्राए.
"गुरुजी, आप तो मुझे तब से जानते हैं जब मुझे ठीक से निक्कर पहनना भी नहीं आता था. मुझे पागल कुत्ते ने नहीं काटा जो बेवजह आपकी नींद खराब करने की हिमाकत करूं. बात यह है कि हमारे जासूसों ने खबर दी है कि वेटिकन के धर्मगुरू ने भारत आने की टिकट कटा ली है. हमारी गीदड भभकियों का उन पर कोई असर नहीं हुआ. अब यदि यह फिरंगी गुरु यहां आता है तो अपनी दुकानदारी का क्या होगा?" गोविंद गिडगिडाते हुए बोला.
"अरे मूरख, तुम्हें भाजपा में क्या भेज दिया, तुम्हारी अकल घास चरने चली गई. शाखा में दी गई शिक्षा भूल गए? हमारी दुकानदारी की सबसे बडी खूबी यही है कि वह प्रतियोगी के बिना नहीं चलती. हमारा केसरिया पेडा तभी बिकेगा जब भोले-भाले ग्राहकों को हम यह बताएंगे कि पडोस के हलवाई की हरी बर्फ़ी में गाय की चर्बी मिली है और इटालियन पिज्जा में सूअर का गोश्त," गुरुजी ने जम्हाई लेते हुए कहा.
"लेकिन गुरुजी, अपने यहां करोडों ऐसे लोग हैं जो सब्जियां महंगी होने के कारण हमारी तरह शुद्ध शाकाहारी नहीं बन पाए हैं. वे तो इन बातों से भुलावे में नहीं आने वाले," गोविंद झिझकते हुए बोला.
'रहोगे तुम निपट मूरख ही. सयाने होते तो अब तक नागपुर मुख्यालय में प्रबंध संघ चालक बन गए होते और मेरी तरह आराम से शुद्ध गाय के शुद्ध दूध से बने पेडे खाते. देश भर के करोडों निक्कर धारियों से गुरु-दक्षिणा वसूल करते, सो अलग," गुरुजी ने गोविंद को फटकार लगाई.
"क्षमा करें प्रभो. दिल्ली में प्रतिदिन प्रेस कोन्फ़्रेन्स संबोधित करने के कारण मेरी मति मारी गई है. मेरी जड हो चुकी बुद्धि में आपकी बात ठीक से नहीं घुस पा रही है. केसरिया पेडे की बिक्री से हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्ज का क्या लेना-देना? महेरबानी कर मुझ गंवार को थोडा ग्यान दें," गोविंद लज्जित होने की मुद्रा में बोला.
"तो सुनो और मैं जो कहता हूं उसे अपनी सिंगापुर से स्मगल की हुई डिजिटल डायरी में नोट कर लो. लगता है तुम्हें अब स्वर्गीय श्री गुरु गोलमालकरजी महाराज के १००१ ब्रह्मवाक्यों की कम्पैक्ट डिस्क देनी ही पडेगी ताकि आगे अपने धंधे के मूलभूत सिद्धांतो को तो न ही भूलो," गुरुजी ने गोविंद को फिर एक बार फटकार लगाई.
"गुरुजी, एक मिनट, मैं फोन से लगा टेप रेकार्डर ओन कर लूं. हां, अब ठीक है, आप के हर सूत्र वाक्यों को मैं रेकार्ड कर रहा हूं ताकि इसे हर रोज सुबह, ध्वज वंदन के समय सुन सकूं," गोविंद ने विनीत स्वर में कहा.
गुरुजी ने खंखार कर गला साफ़ किया, पास पडे तांबे के लोटे में रखा केसर-मिश्रित दूध का एक घूंट भरा, और बोलने लगे:
"हम जिस केसरिया पेडे की लोगों में आदत लगाना चाहते हैं उसकी खासियत यह है कि उसे लोग तभी मजबूरी में खाते हैं जब उनमें दूसरे व्यंजनों के प्रति भय पैदा किया जाए. हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा बेचने वाले भी यही करते हैं. सबकी दुकानदारी एक-दूसरे के माल के प्रति लोगों में आशंका उत्पन्न करने से ही चलती है. यदि बाजार में हरी बर्फ़ी और इटालियन पिज्जा न हों, तो केसरिया पेडा कोई नहीं खरीदेगा."
"केसरिया पेडे ही क्या, सभी रंगों की मिठाइयों की मार्केटिंग की रणनीति का यह एक मात्र शास्वत मंत्र है. अब तुम वह टेप रिकार्डर बंद कर दो तो तुम्हें अति गोपनीय बात बताता हूं जिसे सिर्फ़ देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान पंडितजी एवं खूफ़िया विभाग का संचालन करने वाले मालपानीजी ही जानते हैं," गुरुजी ने फोन के माउथपीस को धोती में लपेट कर फुसफुसाते हुए कहा.
जब वे इस बात से आश्वस्त हो गए कि गोविंद ने टेप रेकार्डर बंद कर दिया है तो गुरुजी बोले, "वेटिकन के धर्मगुरु को यहां आने का निमंत्रण मैंने ही दिया था. ताकि वे आएं और इटालियन पिज्जा की खूब जोर-शोर से मार्केटिंग करें. हमारी वानर सेना तो तैयार ही बैठी है कि कब पिज्जा का कैम्पेन शुरु हो कि उसके खिलाफ़ प्रचार अभियान प्रारंभ करें. वैसे भी त्योहारों का मौसम चल रहा है. अपने केसरिया पेडे होट केक की तरह बिक जाएंगे."
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