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Tuesday, September 20, 2011

सौ चूहे खा के चले हज करने

अपने दस साल के कार्यकाल में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य में सद्बभावना का वातावरण बनाने के घोषित उद्देश्य से अपने ६१ वें जन्म दिवस, १७ सितम्बर, से तीन दिन का अनशन करने जा रहे हैं. यदि ऐसा अनशन उन्होंने गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस पर २७ फ़रवरी २००२ को हुए हमले के बाद किया होता कि जिसमें अयोध्या से लौट रहे ५९ कार सेवक आग में जल कर मर गए थे तो उसके बाद हुई जघन्य हिंसा में २,००० से ऊपर निर्दोष मुसलमान न मारे गए होते. उस समय तो उन्होंने पुलिस प्रशासन से कहा कि हिन्दुओं के गुस्से को प्रकट हो जाने दो, उन्हें मत रोको. राज्य की खूफ़िया पुलिस अधिकारियों के मना करने पर भी उन्होंने जली हुई लाशों को गोधरा से अहमदाबाद लाने से नहीं रोका. लाशों का जुलूस निकाला गया और साथ ही शहर की मुसलमान बस्तियों पर उन्मत्त दंगाइयों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया. 

तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, "मोदी अपना राजधर्म" भूल गए. मोदी सरकार में गृह मंत्री हरेन पंड्या ने नागरिक अधिकार संगठनों द्वारा नियुक्त जांच कमिशन के सामने कबूला कि सरकार ने जानबूझकर मुसलमानों पर हुई हिंसा को रोकने के कोई भी प्रयास नहीं किए. विधान सभा चुनाव घोषित हुए. हरेन पंड्याने मोदी के लिए एलिस ब्रिज विधान सभा सीट खाली करने से मना कर दिया. कुछ ही दिन बाद कुछ लोगों ने गोली मार कर हरेन पंड्या की दिन दहाडे हत्या कर दी. उन की लाश को देखने जब मोदी और तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी अस्पताल पहुंचे तो पंड्या समर्थकों ने नारे बाजी से उनका विरोध किया. मोदी ने तब भी उपवास नहीं किया. 

विधान सभा चुनाव में सद्भावना और भाईचारे की बात के बदले मोदी ने पाकिस्तान-प्रेरित मुस्लिम आतंकवाद पर हिंदुओं को उत्तेजित करने वाले भाषण दिए. भाषणों मे पाकिस्तान के तानाशाह राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ और तुष्टिकरण की नीति अपनाने वाली कांग्रेस पर तीखे प्रहार करके मोदी ने ऐसा माहौल खड़ा कर दिया मानों ये विधान सभा चुनाव नहीं बल्कि हिंदुस्तान बनाम पाकिस्तान का युद्ध हो रहा हो. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर मोदी भारी बहुमत से चुनाव जीत गए. सांप्रदायिक सद्भाव के लिए उपवास की बात तो दूर, मोदी ने सांप्रदायिक तनाव बढाने के ही प्रयास किए.

मोदी की चाटुकारिता कर अपना उल्लू सीधा करने वाले पुलिस अधिकारी इस कोशिश में लग गए कि कैसे भी मोदी की हिन्दु हृदय सम्राट प्रतिमा को मंडित किया जाए. इसी प्रयास के भागरूप शोहराबुद्दिन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी तथा मुम्बई की इशरत जहान की फ़र्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई. इन चाटुकार और आपराधिक मनोवृत्ति वाले पुलिस अधिकारियों को मलाईदार पदों पर नियुक्त किया गया. 

पाप के घडे को एक दिन फूटना ही होता है. निष्पक्ष और कानून एवं संवैधानिक तरीके में विश्वास रखने वाले पुलिस अधिकारी रजनीश राय ने फ़र्ज़ी मुठभेड करने वाले भ्रष्ट और आपराधिक मानस वाले पुलिस अधिकारियों को गिरफ़्तार किया जो चार साल से ज्यादा समय से आज भी जेल के सीखचों के पीछे हैं. नगर मेजिस्ट्रेट एस पी तमांग ने, कि जिन्हें इशरत जहान की पुलिस मुठभेड की जांच की, पाया कि यह एक फ़र्जी मुठभेड़ थी. गुजरात उच्च न्यायालय ने इस की जांच के लिए एक विशेष अन्वेषण दल का गठन किया. इस विशेष दल के एक सदस्य सतीष वर्मा ने भी अपनी जांच में मेजिस्ट्रेट तमांग के नतीजे की पुष्टि ही की. फ़र्जी मुठभेड़ के मामले ने अब और एक नया मोड़ लिया जब शोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने केन्द्रीय अन्वेशन ब्यूरो (सीबीआई) से गुजरात के दो पूर्व राज्य पुलिस महानिदेशक, पीसी पान्डे तथा ओपी माथुर की गिरफ़्तारी की मांग की इस बिना पर कि वे जांच में बाधा पहुंचा रहे हैं. शोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी की फ़र्जी मुठभेड़ की जांच सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को सौंपी है. इसी मामले में गुजरात के गृहमंत्री अमित शाह को गिरफ़्तार किया गया था जिन्हे अदालत ने जमानत पर रिहा तो कर दिया लेकिन जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है. 

इस बीच भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ट अधिकारी संजीव भट्ट ने उच्चतम न्यायालय में एक हलफ़नामा दिया जिसमें उन्होंने कहा कि २००२ गोधरा कांड की रात को मोदी ने मुख्य मंत्री आवास पर अधिकारियों की मीटिंग में हिन्दुओं को अपना आक्रोष प्रकट करने से न रोका जाए ऐसा निर्देश दिया. मोदी सरकार ने संजीव भट्ट को अपने ऊपरी अधिकारी की बात न मानने के आरोप में निलम्बित कर दिया. इसी प्रकार सरकार ने एक अन्य भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी राहुल शर्मा के खिलाफ़ गुप्त जानकारी को जाहिर करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस दी. राहुल शर्मा ने सरकार द्वारा नियुक्त जांच कमिशन को एक सीडी सुपुर्द की थी जिसमें दंगो के समय पुलिस अधिकारियों, मोदी और उनके कई मंत्रियों के बीच हुई मोबाईल फोन पर बात के रेकोर्ड हैं. 

अब जब सर्वोच्च न्यायालय ने २००२ के नरसंहार में मोदी के खिलाफ़ लगे आरोपों की सुनवाई मेट्रोपोलिटन मेजिस्ट्रेट की अदालत को करने के आदेश दिए हैं तो भारतीय जनता पार्टी के नेता इसे मोदी की जीत बतला रहे हैं और यह झूठा प्रचार कर रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय ने मोदी को निर्दोष ठहराया है. उच्चतम न्यायालय का निर्देश फ़ौजदारी कानून प्रक्रिया के अनुरूप है जिसमें किसी भी आपराधिक मुकदमें की सुनवाई पहले सबसे निचली अदालत में ही की जाने का प्रावधान है. उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ़ निचली अदालतों के फ़ैसले पर पुनर्विचार करते हैं. 

सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि मेट्रोपोलिटन मेजिस्ट्रेट २००२ के दंगे में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफ़री की बेवा से उन सभी सबूतों और गवाहियों की जांच करे जो उनके पास हैं. सर्वोच्च अदालत ने उसके द्वारा नियुक्त स्पेशल इन्वेस्टिगेटिंग टीम तथा एमिकस क्यूरी की रपट को भी मेजिस्ट्रेट की अदालत में पेश करने के आदेश दिए हैं. इस के अलावा भारतीय पुलिस सेवा के संजीव भट्ट, राहुल शर्मा एवं रजनीश राय के हलफ़नामा को भी मेजिस्ट्रेट की अदालत जांच करेगी.  

जहां एक ओर उनकी २००२ दंगों में भूमिका को लेकर मोदी पर कानून का शिकंजा कसता दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके खिलाफ़ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं. गुजरात में टाटा सहित कई औद्योगिक घरानों को मिट्टी के मोल खेती की जमीन बांटने में एक लाख करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है यह आरोप विपक्ष के नेता लगा रहे हैं. भाजपा के ही विधायक कनुभाई कलसारिया भावनगर से जामनगर एक सायकल यात्रा पर केवल इस मुद्दे को आगे बढाने के लिए निकले हैं. कलसारिया के नेतृत्व में हुए जन आन्दोलन के कारण हाल ही में उद्योग घराने ’निरमा’ द्वारा खडे किए जा रहे सीमेन्ट प्लान्ट पर हो रहे निर्माण को बंद करना पड़ा. कलसारिया ने भी लोकायुक्त द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ़ भ्रष्टाचार की जांच कि मांग की है. 

गुजरात में २००३ से लोकायुक्त पद खाली है. मोदी ने उच्च न्यायालय और राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त के लिए सुझाए हर नाम का लगातार विरोध किया है. जब मोदी सरकार लोकायुक्त की नियुक्ती में मुख्यमंत्री का अधिकार हो इस उद्देश्य अध्यादेश लाना चाहती थी तो राज्यपाल ने उसपर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और तत्काल उच्चन्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधीश आर ए मेहता को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया. दूसरे ही दिन मोदी सरकार ने लोकायुक्त के कार्यालय पर ताला लगा दिया और उनकी नियुक्ती को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया. लोकायुक्ति की नियुक्ती के मुद्दे को लेकर भाजपा ने संसद के दोनों सदनों की कार्रवाही तीन दिन तक ठप्प कर दी थी. जहां भाजपा नेताओं ने राज्यपाल पर तीखे प्रहार किए, वहीं मोदी ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिख कर न्यायाधीश मेहता के खिलाफ़ सरकार के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने का आरोप लगाया. उच्च न्यायालय ने इस पर मोदी सरकार से यह खुलासा मांगा कि मुख्य मंत्री का प्रधान मंत्री के नाम पत्र की नकल अखबारों तक कैसे पहुंची.

लोकायुक्त की नियुक्ती को लेकर जहां मोदी को न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली, वहीं सर्वोच्च अदालत ने भी मोदी के खिलाफ़ आरोपों पर मेजिस्ट्रेट की अदालत में कानूनी कार्रवाही करने की प्रक्रिया को गतिमान कर दिया. अपने फ़ैसले में सर्वोच्च अदालत ने कहीं भी यह नहीं कहा कि ये आरोप झूठे हैं. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के मिनटों में ही भाजपा के नेताओं ने मोदी निर्दोष हैं इस उद्देश्य के एसएमएस मोबाईल ग्राहकों को भेजने शुरू कर दिए. फ़ैसले पर तीन दिन चुप्पी साधने के बाद मोदी ने अचानक घोषणा कर दी कि वे राज्य में सद्भावना का वातावरण बनाने हेतु १७ सितम्बर से तीन दिन का अनशन करेंगे. इस अनशन के लिए गुजरात विश्वविद्यालय का कन्वेन्शन हॊल खाली करवा दिया गया, उसमें क्लोस सर्किट टेलिविज़न कैमेरा लगा दिए गए और २,००० सुरक्षा कर्मी नियुक्त कर दिए गए. 

मोदी ने अनशन की घोषणा गुजरात की जनता के नाम एक खुले पत्र में की जिसमें उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अब तक चल रहे विवादों का अंत ला दिया और उन सभी लोगों को झूठा साबित कर दिया जो गुजरात की छह करोड़ जनता को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. इस पत्र की भाषा कि जिसमें मोदी ने अपने आप पर लगे आरोपों को गुजरात की जनता पर आरोप के रूप में जतलाने की कोशिश की है, आपातकाल में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देव कान्त बरुआ के इस बहु चर्चित बयान की बू आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि "इन्दीरा ही भारत है और भारत ही इन्दीरा है".

मोदी के अनशन को एक ढोंग बता कर और उनके झूठ तथा भ्रष्टाचार का ’पर्दाफाश’ करने के लिए राज्य कांग्रेस के नेता शंकर सिंह वाघेला, शक्तिसिंह गोहिल तथा अर्जुन मोढवाडीया १७ सितम्बर से ही साबरमती आश्रम प्रांगण में तीन दिन का अनशन कर रहे हैं. हाल ही में मुसलमानों ने रमज़ान के लिए और जैन ने पर्यूषण के पर्व पर उपवास रखे थे जिससे समाज में सद्बावना बढी थी. अब देखना है कि दो राजनैतिक विरोधियों के इन उपवास से क्या होता है.

गुजरात नरसंहार: बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी


उच्चतम न्यायालय ने २००२ के गुजरात में हुए नरसंहार के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार हैं कि नहीं इस बात की जांच अहमदाबाद के मेजिस्ट्रेट की अदालत को सुपुर्द कर दी है. उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि इस जांच में उसके द्वारा नियुक्त स्पेशियल इन्वेस्टिगेशन टीम एवं एमिकस क्यूरी (वरिष्ट अधिवक्ता) की रपट को ध्यान में रखा जाए. साथ ही नरसंहार में जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है उनके द्वारा अतिरिक्त गवाही एवं सबूतों को भी सुना और देखा जाए. 

भारतीय जनता पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश को मोदी को निर्दोष घोषित किए जाना बतलाया है, जो कि अर्ध सत्य ही नहीं बल्कि सरासर झूठ है. उच्चतम न्यायालय ने मोदी के खिलाफ़ लगाए गए आरोपों का कोई खंडन नहीं किया है. बल्कि, २००२ में हुए दंगों में उनकी भूमिका की मेजिस्ट्रेट की अदालत में जांच करने के आदेश ही दिए हैं. अब यह मामला निचली अदालत में चलेगा, और शायद यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. गौर तलब है कि उच्चतम न्यायालय में किसी भी फ़ौजदारी केस की सुनवाई नहीं होती, वहां सिर्फ़ निचली अदालतों के फ़ैसलों पर सुनवाई होती है और उन पर अंतिम फ़ैसला सुनाया जाता है.

लेकिन इस तथ्य को छुपा कर, भाजपा नेता इस भ्रामक प्रचार में जुट गए हैं कि उच्च अदालत ने मोदी को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है और यह कि विपक्ष तथा नागरिक अधिकार संगठन पिछले ११ सालों से मोदी को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं. स्वयं मोदी ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश को ’विवादों का अंत’ बतलाया है और अपने खिलाफ़ लगे आरोपों को गुजरात की ६ करोड़ जनता को बदनाम करने की साजिश कहा है. मोदी ने २००२ के नरसंहार को ’एक क्रिया की प्रतिक्रिया’ कहा था, जब कि तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने गोआ के भाजपा अधिवेशन में मोदी सरकार की आलोचना यह कह कर की थी कि मोदी अपना राजधर्म भूल गए हैं.

जो मोदी करण थापर के टीवी चैट शो के बीच से तब भाग खडे हो गए जब उन्हें २००२ के नरसंहार के कारण धूमिल हुई उनकी छवि को सुधार ने लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने को कहा गया था, अब उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद १७ सितम्बर से तीन दिन का उपवास कर रहे हैं इस घोषित उद्देश्य के साथ की गुजरात में सद्भाव का वातावरण बने. अपने दस वर्ष के कार्यकाल में पहली बार मोदी ने जनता के नाम एक खुला पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अब तक उठाए सभी विवादों का अंत ला दिया है और इस लिए वे अब समाज में सद्भावना अभियान चलाना चाहते हैं. 

उनकी मुसलमान विरोधी छवि के कारण बिहार के मुख्य मंत्री नितीश कुमार ने मोदी को विधान सभा चुनाव प्रचार से दूर रखा था. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के कई घटक दल मोदी के अतिवादी सांप्रदायिक तेवर के कारण उनसे कतराते रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा कई युवा नेता मोदी को भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. अब जब २००२ के नरसंहार में उनकी भूमिका का मामला निचली अदालत में चलाए जाने में एक लंबा समय लगने की संभावना है तब मोदी अपने आप को एक सेक्यूलर राष्ट्रीय नेता के रूप में साबित करना चाह रहे हैं. जब तक उन पर लगाए आरोप साबित या खारिज नहीं होते, साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका होगा और राष्ट्रीय राजनीति भी किसी अनिश्चित मोड़ पर पहुंच चुकी होगी. 

भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में संभावित भूमिका के बारे में अटकलों को यह कह कर बढावा दिया कि देश को मोदी जैसे बहु प्रतिभावान एवं प्रभावी नेता की आवश्यकता है. लेकिन गुजरात में मोदी की मौजूदा हालत नाजुक प्रतीत हो रही है. एक ओर जहां उनकी २००२ के नरसंहार में भूमिका को लेकर वरिष्ट पुलिस अधिकारी जैसे संजीव भट्ट, राहुल शर्मा और रजनीश राय ने हलफ़नामा देकर सवालिया निशान खड़े कर रखे हैं, जिसको निचली अदालत अनदेखा नहीं कर सकती, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल श्रीमती कमला बेनीवाल द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर ए मेहता की लोकपाल के पद पर की गई नियुक्ती को राज्य सरकार द्वार चुनौती देने से मोदी पेंचीदी परिस्थिती में फ़ंस गए हैं.

लोकपाल के लिए पूर्व न्यायाधीश मेहता के नाम का सुझाव गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं दिया था. तदुपरांत, वर्तमान कानून में लोकपाल की नियुक्ती का अधिकार राज्यपाल को ही है, न कि राज्य के मुख्यमंत्री को. लोकपाल का पद पिछले सात साल से खाली पडा था जिसे मोदी सरकार ने अपनी आपत्ती जता कर भरने नहीं दिया था. इस पर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के दाखिल करने पर, राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी करने के प्रयास किए जिसमें लोकपाल की नियुक्ती का अधिकार मुख्यमंत्री को दिए जाने का प्रावधान था. इस अध्यादेश पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और ततकाल न्यायाधीश मेहता की नियुक्ती की घोषणा कर दी.

राज्यपाल द्वारा मेहता की नियुक्ति की घोषणा के दूसरे ही दिन मोदी सरकार ने लोकपाल कार्यालय पर ताला लगा दिया और उनकी नियुक्ती को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया और मोदी सरकार को एक नोटिस भेजी कि वह इस बात की सफ़ाई दे कि कैसे मोदी द्वारा प्रधान मंत्री को लिखा गया पत्र अखबारों तक पहुंच गया जिसमें मोदी ने न्यायाधीश मेहता के खिलाफ़ सरकार के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने का आरोप लगाया गया था. 

इस से पूर्व राज्य कोंग्रेस के एक प्रतिनिधी दल ने राष्ट्रपति को मिल कर मोदी सरकार के खिलाफ़ एक प्रतिवेदन दिया गया था जिसमें गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे. कोंग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कई औद्योगिक घरानों को करोडों रुपए की जमीन माटी के मोल बेच दी है जिसमे सरकार को एक लाख करोड रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा है.

इन आरोपों की जांच लोकपाल न कर सके इस उद्देश्य से मोदी सरकार ने एक जांच आयोग की घोषणा कर दी. जब कोई जांच आयोग किसी मामले में जांच कर रहा हो उस परिस्थिती में लोकपाल उस पर कोई कार्रवाही नहीं कर सकता ऐसा लोकपाल कानून में प्रावधान है. 

Sunday, November 25, 2007

Ram and Rahim

When in 1906, young barrister Mohandas Karamchand Gandhi launched his satyagraha in South Africa against the discriminatory treatment being meted out to people of Indian origin, his chief lieutenants included Hindus, Muslims, Parsis, Dalits and Christians. Among his colleagues were also Chines, British and Germans. Indeed Gandhi was a Vishwamanav (global citizen) whose quest for truth could not be constricted by the consideration of caste, creed or colour.

When he set up the Satyagraha Ashram on the bank of the Sarbarmati river in Ahmedabad a decade later, Gandhiji nominated Imam Abdul Kadir Bawazeer, a Muslim priest who had courted jail in 1910 as a Satyagrahi in South Africa, as the vice-chairman of the ashram's managing committee. Bawazeer succeeded Gandhiji's secretary Mahadev Desai as the chairman of the ashram after the latter was arrested during the Salt Satyagraha in 1930. And, when Gandhiji was arrested, he nominated 76-year-old Justice Abbas Tayyabji to lead the Salt Satyagraha.

Gandhiji's Satyagraha ashram was a global village. Its inmates included Hindus, Jains, Muslims, Parsis and Christians. Even Miraben, the youngest daughter of an admiral of the British Royal Navy, was an ashram inmate, such broad was Gandhiji's concept of universal brotherhood.

When in 2002, a group of concerned citizens gathered at the satyagraha ashram to discuss ways to promote communal harmony, it was attacked by a mob crying 'Jai Shri Ram'. A few days back, the mob that had destroyed the mausoleum of Vali Deccani, a.k.a Vali Gujarati, the great poet credited with founding the composition of shaayari, was also shouting the same very war cry of 'Jai Shri Ram'.

Gandhiji had popularized the singing of the hymn:
"Raghupati Raghav Raja Ram, Pateet Paavan Sita Ram
Eeshwar, Allah Tere Naam, Sabko Sanmati De Bhagwan"

The Muslim, Christian and Parsi inmates of the satyagraha ashram sang the hymn with equal devotion as it was a prayer to one God who was known by different names and whose blessings the hymn sought so that good sense prevailed among all human beings.

But since December 6, 1992, when fanatic Hindu mobs demolished the Babri mosque at Ayodhya as an act of revenge against the 15th Century Moghul emperor, Babar, the chant of 'Jai Shri Ram' has assumed violent connotation, striking terror among the non-Hindus, specially Muslims whom the Hindu fanatics chided as 'Babar ki Aulad' (Descendants of the Moghul emperor).

Saturday, November 24, 2007

Hate Campaign

Though there appears to be a surface calm in Gujarat, the Modi government and the Sangh Parivar continue to target the Muslims. The state government is out to subverting the process of justice to ensure that no one involved in the 2002 carnage is punished. The Best Bakery case in a glaring example of this. In the Best Bakery case, the session's court has acquitted all the 21 accused of killing 14 hapless people, including women and children, after the key witnesses were coerced by the local BJP MLA and his municipal councilor brother into retracting their statement. Similar has been the fate of most of the cases of heinous crimes in which BJP, VHP and RSS activists are the accused.

While those who had committed murder, rape, loot and arson are roaming fearlessly, the police is hunting down Muslim youths, foisting trumped up charges against them and arresting them under the draconian Prevention of Terrorist Activities Act (POTA). In most of the POTA cases, the charge leveled against the detained person is the same that he had been recruited by Pakistan's intelligence agency, ISI, after the Godhra carnage, taken to Pakistan, trained there in terror tactics and brought back to Gujarat to attack Hindu places of worship and kill leaders of the BJP and VHP.

In times of communial violence in Gujarat, the language press sheds its yellow and dons deep saffron. The Gujarati press has proved time and again that pen is mightier than a trishul (trident). With scant regard for journalistic ethics, the Gujarati press has been adding fuel to the fire by whipping up communal passions.

The Muslims in Gujarat are a hounded lot, condemned by the ruling party politicians (BJP and its VHP-RSS allies), a partisan police force and civil administration and a belligerent press. If this is not Fascism, what is it?

Thursday, November 22, 2007

Saffron Surge

But it was chiefly because of some retrogressive action of the Congress government like the decision to nullify the Supreme Court's judgment on the Shah Bano case through an ordinance and Prime Minister Rajiv Gandhi's move to throw open the Babri mosque for the devotees of Lord Ram, that gave a shot in the arm to communal elements among both the Hindus and Muslims.

It was Prime Minister V P Singh's decision to implement the recommendation of the Mandal commission on socially and economically backward classes that hastened the BJP to take up the issue of Ramjanmabhoomi temple in Ayodhya, lest the coming together of all the depressed classes - harijans, advisasis, other backward classes (OBCs) becomes a formidable obstacle to the Sangh Parivar's dream of turning India into a Hindurashtra.

The Sangh Parivar systematically went about recruiting and mobilizing harijans, adivasis and members of other backward classes for the Ramajanmabhoomi campaign. Through the campaign, the Sangh Parivar managed to 'sanskritize' and bring under the fold of Hindutva members of those communities who had been suffering the humiliation of untouchability for centuries. When the bricks meant for the construction of the Ram temple in Ayodhya were consecrated in a Dalit colony or a slum, those who participated in the ceremony felt equal to the caste Hindus.

Simultaneously, the Ramjanmabhoomi campaign portrayed the Muslims as 'enemies' of the country who had no place in the Hindurashtra. The Indian Constitution had rejected the two-nation theory by adopting secularism. Hence, what could not be achieved through constitutional means, the Sangh Parivar sought to achieve through unconstitutional and extra-parliamentary means by driving a communal wedge in the Indian society.

Polarization of society on communal lines has vastly benefited the BJP as is evident from the increasing strength of its members in both the Parliament and the various state assemblies. The communal carnage, which triggered off the ghastly memories of Nazi concentration camps, that shattered Gujarat between February and April 2002, was translated into a mandate for chief minister Narendra Modi to rule the state for yet another five years.

The Gujarat assembly election results porten a serious threat to the secular India because the BJP and its extra-parliamentary allies, the VHP, the Bajrang Dal and the RSS, have made it amply clear that they will be trying out the 'Gujarat Experiment' in the elections to the assemblies of six states later this year as also in the parliamentary general elections the next year.




Wednesday, November 21, 2007

Partitioning Hearts - Part II

How could the armed mobs, out on the roads to retaliate the killings of VHP activists, track down Muslim business establishments throughout the state in a matter of hours?

The VHP leader Pravin Togadia's disclosure in an interview he had given me for the Calcutta daily, The Telegraph, on January 10, 1992, flashed through my mind. Togadia had boasted that the VHP had undertaken a census and land record survey to take stock of the real estate ownership pattern among Hindus and Muslims in over 18,000 villages, towns and cities of the state.

The survey, he said, would provide the VHP leadership with the necessary data that would help formulate short-term and long-term strategies for 'protecting' the interests of the Hindu community in 'sensitive' areas.

The survey, he said, would help the VHP draw up a 'boundary' line in all the major towns and cities beyond which the Muslims would not be allowed to expand. "We will establish border check posts manned by Bajrang Dal volunteers to instill a sense of security among the Hindus," he had disclosed in the interview.

The large-scale rioting that occurred in the run up to the demolition of the Babri mosque in Ayodhya on December 6, 1992 and thereafter witnessed how property owned by the Muslims were mde target by arsonists and plundering mobs.

By drawing up a boundary line, the VHP is trying to create a 'Hindustan' and a 'Pakistan' in almost all the villages and towns of Gujarat, the birthplace of Mahatma Gandhi who lived and died for love, peace and non-violence.

The VHP has put up signboards at the entry points of all major towns in the state welcoming visitors to 'Hindurashtra's such and such town.' The unstated message in these signboards is louder: The country belongs only to the Hindus; all others have place in it.

(Part I)