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Wednesday, July 02, 2014

बांग्लादेश के शरणार्थी और तरुण शांति सेना

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम (१९७१) के समय तरुण शांति सेना ने कई शरणार्थी शिविरों में राहत, सफाई और स्वास्थ्य सेवाएं देने का काम किया था. मेरी बड़ी बहन संघमित्रा उस समय कलकत्ता की नील रतन सरकार मेडिकल कोलेज में पढ रही थी और ओक्सफ़ाम के साथ मिल कर शरणार्थियों के बीच काम कर रही थी. जयप्रकाश नारायण के निर्देश में पिताजी बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के लिए विश्व जनमत हेतु पदयात्रा आयोजित कर रहे थे.
पाकिस्तान सेना बांग्लादेश में जन संहार, बलात्कार और लूट मार कर रही थी. भयाक्रांत लोग करोड़ों की तादाद में अपना घर द्वार छोड़ कर भारत की शरण में आ रहे थे. उनके लिए जगह-जगह राहत शिविर खोले गए थे जहां उन्हें खाना और चिकित्सा सुविधाएं दी जा रही थीं. मैं तरुण शांति सेना के साथियों के साथ सिलीगुड़ी से १५-२० किलो मीटर दक्षिण, बांग्लादेश की सीमा से ५ कि.मी. उत्तर एक शरणार्थी शिविर में राहत कार्य कर रहा था.
शिविर में पचास हजार के करीब शरणार्थी थे. ज्यादातर बूढे, महिलाएं और बच्चे. कुछ जवान भी थे. शिविर में सबसे बड़ी समस्या थी सफाई की. लोग अपने अपने तम्बू के आस-पास ही शौच-पेशाब करते थे. चारों तरफ दुर्गंध और मक्खियों की भिनभिनाहट. भयंकर दुर्गंध से बचने के लिए मुंह पर रूमाल बांधना पड़ता था.
चावल, दाल, चीनी, चाय की पत्ती, कपड़ों के लिए शरणार्थियों में झगड़े होते थे. जवान और दबंग लोग जरूरतमंद लोगों तक राहत सामग्री पहुंचने नहीं देते थे, बीच में ही कब्जा कर लेते थे. हमें इस लूट को रोकने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी. कई बार कठोर कदम भी उठाने पड़ते थे.
युवाओं को शिस्तबद्ध करने के ईरादे से मैंने एक नियम जारी किया. रोज सुबह हमारी कैम्प ओफिस के पास के मैदान में उनकी परेड करानी शुरू की. रोज सुबह हाजिरी ली जाती थी. परेड करवाया जाता था और उनसे बांग्लादेश का राष्ट्रगीत "आमार सोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालो बासी" गवाया जाता था. जो गैर हाजिर रहता उसे उस दिन का राशन नहीं मिलता.
कैम्प में सफाई की गंभीर समस्या थी. लोग कैम्प के बाहर बनाए गए ट्रेन्च लैटरीन का इस्तेमाल न कर बाहर, खुले में ही शौच करते. हमने उन्हें शर्मिन्दा करने के लिए खुद फावड़ा, झाडू और बाल्टी ले कर जहां कहीं मल दिखाई दे उसे उठाना चालू कर दिया. इसका बिजली की तरह असर हुआ. दो-तीन दिन में लोगों ने बाहर खुले में शौच करना बंद कर दिया.
मेरे मामा समरेन्द्र नाथ महान्ती पास में बागडोगरा वायु सेना स्टेशन के कमांडिंग अफसर थे. एक बार उनकी सिफारिश से सेना की जीप से हम बांग्लादेश की सीमा के उस पार करीब २० कि.मी. अंदर गए. भारतीय सेना के साथ बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी के जवान पाकिस्तान की सेना से लड़ रहे थे. उनकी छावनी में कुछ घंटे बिता कर हम वापिस अपने शिविर आ गए.
रोज रात को हमारे शिविर में तोप के गोलों के फटने की आवाज सुनाई देती थी. हमारी वायुसेना के बम वर्षक विमान उडते सुनाई देते थे. बडे रोमांचक दिन थे.
पिछले साल सितम्बर में मुझे बांग्लादेश जाने का मौका मिला. कलकत्ता से ढाका बस से और ढाका से चिटागोंग कार से यात्रा की. चारों तरफ़ हरियाली, नदी और तालाब देख कर मन खुश हो गया. बांग्लादेश में वाहन सी.एन.जी गैस से चलते हैं, इसलिए प्रदूषण बहुत कम है. नदियों में नाव और जहाज से काफ़ी यातायात होता है.
मेरी नानी का ननिहाल ढाका के पास बिक्रमपुर है. समय और धन की कमी से जा न सका. अगली बार जब भी बांग्लादेश जाने का मौका मिलेगा तो बिक्रमपुर जरूर जाऊंगा.