Monday, August 18, 2014

सेठ धनीराम का मोती

हमारे मोहल्ले का एक कुकुर था. उसका नाम लोगों ने रखा था हिटलर. बहुत गुर्राता था और भौंकता था. दूसरे कुकुर का सीना चौदह इंच का था. वह अपना सीना फुला कर छप्पन इंच का कर लेता था. लेकिन था वह बड़ा डरपोक. अकेला बाहर न निकले जब तक साथ में आठ-दस लाठीधारी लोग न हों. 

हिटलर सेठ धनीराम का चहेता था. कंजूस थे सो दूधवाले को पटाकर सारे मुहल्लेवालों के दूध में से कटोरा कटोरा निकाल कर हिटलर को पिलाते. दूधवाला सरकारी नल का पानी मिला कर भरपाई कर देता. हिटलर दिन रात धनीराम की छबीस मंजिली हवेली के तहखाने में पड़ा रहता.

कई बार सेठ का मोटू बेटा हिटलर को अपनी चमचमाती गाडी में शहर की सैर कराने ले जाता. मोटू को तेज रफ़्तार से गाडी चलाने का शौक था. एक बार उसकी गाडी से सड़क पर सोए कई पिल्ले कुचल कर मर गए. उस दिन हिटलर रोया, मगर दूध नहीं छोड़ा. 

एक बार सैर करते वक्त हिटलर की नज़र पड़ोस की कमसिन कन्या पर पड़ी. उसे पहली नज़र में प्यार हो गया. थी तो वह हिटलर की बेटी की उम्र की. मगर प्यार में उम्र से क्या मतलब. सेठ से कह कर हिटलर ने उसपर चौबीस घंटे नज़र रखवानी शुरू की. जासूसी का काम शहर के कुख्यात शेयर दलाल को सौंपा गया. दलाल को सेठ लौंडपन से जानता था जब वह मोहल्ले की शाखा में डंडा भांजने आया करता था. 

हिटलर की वैसे बचपन में ही शादी हो गई थी एक मासूम और धार्मिक कन्या से. लेकिन हिटलर था बड़ा मनचला. ब्रह्मचर्य व्रत का बहाना बना कर वह गाँव छोड़ शहर भाग आया. बस स्टैंड के पास ही चाय की दूकान को उसने अपना अड्डा बना लिया. चाय की दूकान थी, सो दूध और बिस्कुट मिल जाया करती थी. 

चाय की दूकान पर कई प्रचारक भी आते थे. पूँछ हिला हिला कर, और तलुए चाट चाट कर हिटलर उनका विश्वासपात्र बन गया. चाय की दूकान छोड़ कर उनके साथ लग लिया. संघ का साथ मिल जाने के बाद तो हिटलर की दिन दुगुना, रात चौगुनि तरक्की होती गई. 

सोमनाथ से अयोध्या, गांधीनगर से गोधरा, मथुरा से मुज़फ्फरनगर और अंत में बनारस में हिटलर से मोती नाम धारण कर बिना कत्था के पान पर खाली चूना लगाया और हथिया लिया हस्तिनापुर. मोती सेठ धनीराम के पिलाए दूध का क़र्ज़ भूला नहीं है, लोगों को पानी पिला पिला कर सेठ को मलाई पहुंचा रहा है. 

Saturday, July 26, 2014

शुद्ध गाय का शुद्ध दूध

"एक शुद्ध हिन्दू के लिए आवश्यक है शुद्ध गाय का शुद्ध दूध पीना. उसे चाहिए अपने घर में एक गोशाला रखे जिसमें कम से कम सात पुश्त से देशस्थ ब्राह्मण द्वारा प्रमाणित देशी नस्ल की ही गाय हों. इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाए कि किसी भी पूर्वज गो माता  का संवनन किसी विदेशी नस्ल के नंदी से न हुआ हो."

गुरु गोलमालकर ने उक्त वचन सभी प्रान्तों से एकत्र हुए संघ प्रचारकों की एक गुप्त बैठक में कहे. "ध्यान रहे बकरी का दूध पीने वाला मलेच्छ होता है. और मलेच्छ भारत माता की संतान कभी नहीं हो सकता. वेद और पुराण में कभी पढ़ा है अपने ऋषि मुनि बकरी का दूध पीते थे? कभी नहीं. वे तो शुध्ध देशी गाय का शुद्ध दूध ही पीते थे. जो गाय शुद्ध नहीं होती थी, या शुद्ध दूध नहीं दे सकती थी उसे हवन में आहूत कर दिया जाता था."

"संघ में हमने कई अशुद्ध नस्ल के स्वयंसेवक भर्ती किए हैं. मगर ये कभी संघ के उच्च पद पर आसीन नहीं किए जायेंगे. संघ में केवल मध्य प्रान्त के नागपुर नगर के प्रमाणित शुद्ध ब्राह्मण का ही वर्चस्व होगा," गुरूजी ने अपनी वक्षस्थल तक लहराती हुई श्वेत-श्याम दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा. 

"काश्मीर के पंडित शुद्ध नहीं होते. उनके पूर्वज हो न हो या तो यवन रहे होंगे या अरबस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, इराक या ईरान के मलेच्छ. राजनीति के चलते हमने भले ही काश्मीरी पंडितों को उनके प्रान्त वापस बसाने का वादा किया हो. लेकिन ये तो केवल चुनावी वादा था, जिसे गंभीरता से न लें."

"सभी शाखा प्रमुखों को मैं यह स्पष्ट निर्देश देता हूँ कि वे स्वयंसेवकों के विचार शिविरों में काश्मीरी पंडितों की वंशावली पर सवाल उठाना शुरू कर दें. उन्हें यह बताये की नेहरु के पितामह नूर मोहम्मद थे. फिरोज़ गाँधी पारसी नहीं मुसलमान थे और उनका इंदिरा से निकाह हुआ था. नेहरु परिवार और शेख अब्दुल्लाह खानदान का खून का रिश्ता है."

"बकरी का दूध पीने वाले लंगोट धारी देश द्रोही का तो हमारे ब्राह्मण सपूत ने वध करके वीर गति पा ली. अब जो बचे खुचे मलेच्छ हैं उन्हें ठिकाने लगाने का काम हमारे भाड़े के टट्टू तोगड़िया, गिरिराज और सिंघल को सौंप दिया है. वे बड़ी लगन से मलेच्छ संस्कृति की निंदा भर्त्स्यना करने में लग गए हैं. मुज़फ्फरनगर संहार के वीर को हमने सत्ता दल का अध्यक्ष बनवा दिया है और उसे आदेश दे दिए गए हैं कि सरकार पर कड़ी नज़र रखे."

"अच्छे दिन आने में अब ज्यादा देर नहीं है. विपक्ष को तो उनकी औकात दिखा दी गई है. अब जिन राज्यों में हमारी सरकार नहीं है वहां 'गुजरात मॉडल' लागू कर के चुनाव करवाने की बस देर है. सभी राज्यों पर अपना कब्ज़ा हो जाए फिर संविधान तो हम चुटकियों में बदल देंगे. भारत को हिन्दू राष्ट्र बनने से फिर कोई नहीं रोक सकता."

इतना कह कर गुरु गोलमालकर जी ने अपना प्रवचन समाप्त किया और उठ कर शयन कक्ष में चले गए. 

दिल मेरा एक आस का पंछी

कृति वीरानी रसोई घर में पड़ोस के भैया जी के भैंस के तबेले से चुरा कर लाए गोबर के उपलों पर सास के लिए टमाटर का सूप बना रही थी. टमाटर की जगह  मैग्गी का टोमेटो केचप इस्तेमाल कर रही थी. टमाटर तो एक सौ रुपये किलो मिल रहे थे. अब अगर टमाटर से रोज सूप बनाने लगे तो पति देव के लिए बियर कैसे आएगी? सो, केचप से ही काम चलाया जा रहा था. 

पिछले पचास दिन से वीरानी परिवार शुद्ध शाकाहारी बन गया था. कृति ने पड़ोस के जैन परिवार की मंझली बहू से बिना प्याज, लहसून का प्रयोग किए एक से एक बढ़ कर स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का गुर सीख लिया था. "मंझली बहू बिना प्याज का जो आमलेट बनाती है उसे कई मुनी और गुणी बहुत पसंद करते हैं," कृति ने अपनी सास को यह राज की बात बता दी थी. 

वीरानी परिवार ने बहुत सोच समझ कर गैस का इस्तेमाल भी बंद कर दिया था. एक तो अच्छे दिन लाने के लिए सरकार ने गैस सिलिंडर के दाम बढ़ा दिए थे और फिर पाइपलाइन से घर घर मिलने वाला गैस भी देशभक्त कंपनियों ने दुगुने से भी ज्यादा महंगा कर दिया था. भाई शेयर होल्डर्स के भी तो अच्छे दिन आने चाहिए कि नहीं? पिछले चुनाव के समय मिस्टर वीरानी ने भी दो देशभक्त कंपनियों के एक - एक हजार शेयर ले लिए थे. जिस दिन चुनाव के नतीजे आए उसी दिन इन शेयर के भाव चार गुना बढ़ गए थे. मिस्टर वीरानी इस दिवाली की छुट्टियां ऑस्ट्रेलिया में मनाने का प्लान बना रहे हैं. 

मिस्टर वीरानी का छोटा भाई, जिसे पहाड़ के गाँव में गायों और खेत खलिहान की देखभाल के लिए रख छोड़ा था, वह कई दिनों से भाभी जी के दर्शन करने आना चाह रहा है. बुलेट ट्रेन के शुरू होते ही आने का सोच रहा है. अभी तो जो एक मात्र पैसेंजर ट्रेन है उसका किराया तो हवाई जहाज से भी ज्यादा है. अब अगर भाई साहब उसे यहाँ हवाई जहाज से बुलाने का सोच बैठे तो बहुत मुश्किल हो जाएगी. बुलेट ट्रेन तो बस यूं पलक झपकते आ जाएगी.

ट्रेन से यात्रा तो मिस्टर वीरानी भी पसंद करते हैं. जब से गैस कंपनी ने मेट्रो ट्रेन शुरू कर दी तब से वे ऑफिस उसी से जाते आते हैं. हाँ साथ में एक छाता भी ले कर जाते हैं. यह बारिश भी इतनी बेशरम है कि मेट्रो की छत फाड़ कर रिम झिम के गीत सावन आए वाला जीतेंदर का गीत सुनाती रहती है. वैसे मिस्टर वीरानी को ट्रेन में रेन डांस करते लड़के लड़कियों को देखना अच्छा लगता है. ऑफिस तक का सफ़र यूं चुटकियों में तय हो जाता है. 

इधर क्लाइमेट चेंज के बारे में भी लोग बहुत सचेत हो गए हैं. जो पहले स्कूटर या मोटर साइकिल से काम पर जाते थे वे अब पैदल, साइकिल या जिनको ऑफिस से सीजन पास का भत्ता मिलता है वो मेट्रो ट्रेन से यात्रा करने लगे हैं. पेट्रोल और डीजल की बचत हो जाती है, देश को अच्छे दिन जो देखने हैं. 

All gas and bullshit

Health minister Dr. Gobardhan was summarily summoned by Fakendra  Lodi. The call came at 8 PM. Feku, as Fakendra was endearingly called by his blind followers, had a serious pathalogical problem. Despite consuming almost one kilogram of isabgol, airlifted by the special executive jet of oil tycoon Adambani, from Unjha to Tughlakabad, Feku had failed to hit the jackpot. There was only thunder, no shower. 

"Hey Rama ! If the clouds fail to deliver before my scheduled date at the White House, I will end up ejaculating only "Oh Bam Aah, Oh Bam Aah!" on the dinner table. I must cure myself of this congenital ailment immediately," Feku muttered to himself. "Gas works fine till the election time. In fact, the gas has had a mesmerizing effect on the voters who could not differentiate between fragrance and foul smell. Not any more, specially before world's biggest bluff who has successfully befooled everyone into believing that Uncle Sam epitomized virtue, morality and universal brotherhood."

Dr. Gobardhan hurriedly picked up his physician's bag and left post-haste to attend to the boss. A head-reeling smell hit the doctor as he entered Feku's master bedroom. "I need to get accustomed to this odor if I have to retain my job," he said to himself, barely stopping from plugging his nostrils with a handkerchief. 

Feku's balloon pressure (BP) had crossed the double digit figure, keeping pace with the wholesale price index and the rate of inflation. "Boss, nothing to worry about. You will soon start siinging, 'Happy days are here again.' Look, the bhakts are still chanting 'Achche Din aa gaye, aa gaye'," Dr Gobardhan said trying hard to sound confident. 

"Cut the crap. Can't you see I am suffering?," thundered Feku.  This gaseous problem refuses to solidify. You know, I can tackle any solid task that confronts me. But not this amorphous challenge of gas. Look at the irony. I am suffering because of non-stop generation of gas, while my patron tycoon is complaining of less gas find in the offshore Kinder Garten (KG) basein. My pet company GSPC too has failed to hit the gas despite having spent Rs. 8 k core."

"Saheb! Saheb!! Be cool, sit on the stool. You will be fine with just one dose of this specially concocted potion prepared by Baba Kamdev. Just one dose and presto, there will be a solid solution tomorrow morning, for sure. I am prepared to bet my Lage Raho Munnabhai degree," Dr Gobardhan said in a reassuring tone. 

Whether the potion worked or failed will be known only at the dinner table of the White House.

कसम आर्याव्रत की....

चुनाव के समय देश भर में आयोजित हिन्दू ह्रदय सम्राट की  हूंकार, चीत्कार, हाहाकार जनसभाओं से लोगों में वीर रस और देशभक्ति उछाल मारने लगा था. सम्राट का राज्याभिषेक भी हो गया. विजय उल्लास में देश के कोने-कोने में पल रहे विधर्मियों के धर्मस्थलों पर हमला बोल कर राष्ट्र भक्त सैनिकों ने उन्हें सन्देश भी दे दिया कि 'आर्याव्रत' सिर्फ आर्यों का है, अगर यहाँ रहना है तो आर्यों की तरह रहो, वरना देश छोड़ दो. 

लेकिन यह क्या? राज्याभिषेक के कुछ ही दिनों में हवा उलटी बहने लगी. देशभक्तों से त्याग और बलिदान की आशा रखना गलत साबित होने लगा. देश ने उनसे लहू तो नहीं माँगा था. साठ साल की गुलामी से देश को आज़ाद कराने के लिए छोटा सा सहयोग ही माँगा था. गैस और तेल के दाम बढाकर सम्राट ने सबसे बड़े महाजन से लिया कर्ज ही तो अदा करने की दिशा में एक पहला कदम उठाया था. चीनी के दाम भी इसलिए बढाए कि मधुमेह से कमजोर होती जा रही नस्ल को बचाया जा सके. रेल का किराया इसलिए बढाया कि हजारों की तायदाद में लोग अपना गाँव छोड़ कर नरक का जीवन बिताने शहर की तरफ न भागें. 

राष्ट्र हित में लिए ये निर्णय "कडवी दवाई" की तरह हैं. जो समझदार हैं, देशभक्त हैं, उन्हें यह बात समझ में आती है. मगर ६९ प्रतिशत देशद्रोही जनता इस बात को नहीं समझती. जहाँ देश में ये लोग भीतर घात कर रहे हैं, वहीँ मौके का फायदा उठाकर पडोसी देश भी रात - दिन सम्राट की छप्पन इंच की छाती पर मूंग दलने में लगे हैं. सम्राट ने अपने राज्याभिषेक समारोह में दावत पर बुलाने की शराफत क्या दिखाई, इन्हें लगा समस्त आर्य नस्ल कमजोर है, डरपोक है. आर्याव्रत की सीमा पर प्रतिदिन कर्णभेदी पटाखे छोड़े जा रहे हैं. दूसरी ओर चीनी के दाम बढाने पर चीनियों को क्यों मिर्ची लग गई जो आर्याव्रत के पूर्वोत्तर खंड को अपने नक़्शे में दिखा कर जीभ और ठेंगा दिखा रहे हैं, "दम है तो उखाड़ लो !"

आर्याव्रत के सम्राट का प्रतिदिन हो रहे अपमान से व्यथित और चिंतित हो कर मध्य भारत के वक्षस्थल पर कुंडली मार कर विराजमान गुरु घंटाल ने सबसे पहले तो शकुनी मामा के कलियुगी अवतार को अपने पास बुला भेजा. "सुन लो, तुम्हें हमने शासक दल का नेता ऐंवे नहीं बनाया है ताकि तुम्हारे ऊपर लगे खून के छीटें धुल जाएँ. बल्कि, इसलिए बनाया है कि तुम सम्राट के सभी दरबारियों पर नज़र रख सको और राष्ट्र विरोधी ताकतों को सबक सीखा सको. मुज़फ्फरनगर में तुमने जो कमाल कर दिखाया उससे परिवार के सभी वरिष्ट संचालक तुमसे प्रसन्न हैं," गुरु घंटाल ने संघ कार्यालय के गर्भ गृह में रखे घंटे को हिलाते हुए कहा. 

घंटे की आवाज़ सुन कर कम्भे के पीछे छिपे गणवेषधारी सैनिक लपक कर गुरूजी का अगला आदेश लेने पहुँच गए. "शाह को इन्टरनेट खोल कर दो, स्टॉक मार्किट बहुत उछल कूद मचा रहा है. बाबा कामदेव ने हमारा स्विस बैंक में जो धन जमा कराया है उसमे से निकाल कर बिजली, गैस, फ़र्टिलाइज़र, इन्सुरांस, रक्षा उद्योग के शेयर खरीद लो. सबके भाव बढ़ने वाले हैं. चुनाव प्रचार के समय शेयर बाज़ार में जो लगाया था वह तो जिस दिन सम्राट की ताजपोशी हुई उसी दिन दस गुना हो कर वापस मिल गया. अब तो सम्राट ने विदेशी धन निवेश को खुली छूट देने की घोषणा कर दी है, झोंक दो पूरी ताकत. स्वयंसेवकों की सात पुश्तों का भविष्य बन जाएगा," गुरूजी ने शाह को निर्देश दिए. शाह स्टॉक मार्किट के घिसे हुए खिलाड़ी जो ठहरे. 

शाह को आवश्यक दिशा निर्देश देने के बाद, गुरूजी ने अपने तकिये के नीचे छिपा कर रखे सॅटॅलाइट फोन को निकाला और सीधे सम्राट का फोन मिलाया. "सुनो, अब तो ब्रिक की झिक झिक से तुम्हे फुरसत मिल गई होगी. तुम्हारी सहूलियत के लिए ब्रिक बैंक की ईंट भी तुम्हारे हाथ से रखी जानी है. फिर क्या, चांदी ही चांदी है. आगे की रणनीति के लिए तुरंत बैठक बुलाओ. संघ परिवार के सभी शीर्ष नेता बेताब हो रहे हैं तुम्हे जरूरी मार्गदर्शन देने के लिए. विश्व में आर्याव्रत का आधिपत्य कायम करना है कि नहीं?"

"जी गुरूजी, अभी बुलाता हूँ," सम्राट घिघिया कर बोले. 

सम्राट के निवास पर संघ परिवार के शीर्ष नेताओं की चार घंटे चली बैठक में जो गुप्त रणनीति तय हुई उसका पता तो आने वाले दिनों में ही चलेगा जब न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका तय किए गए एजेंडा पर चलना शुरू कर देंगे. इस बीच संघ परिवार की निजी सेना विधर्मियों को डरा धमका कर, और न मानें तो उनके मूंह में रोटी ठूंस कर, आर्यधर्म का पालन करवाने में लग जाएगी. 

महंगाई, भ्रष्टाचार, काला धन, बलात्कार, अत्याचार  जैसे फालतू सवालों ने बवाल मचा रखा है. देश प्रेम क्या ऐसे व्यक्त किया जाता है ?

मैत्रेय

देखते ही देखते अगले महीने मेरा पौत्र मैत्रेय पांच साल का हो जाएगा. उसका जन्म 22 अगस्त 2009 की सुबह घर के पास एक छोटे से नर्सिंग होम में हुआ. पैदा होने के 15 मिनट बाद दाई ने उसे नहला धुला कर गठरी बना कर मेरे हाथ में रखा. उसकी माँ बेहोशी की हालत में थी. 

मैं दादा बन गया. ख़ुशी हुई, कुछ अजीब भी लगा. अचानक, छलांग मार कर एक पीढ़ी आगे पहुँच गया. हमारे परिवार की इस अनमोल घडी को मैंने कैमरा में कैद कर लिया फोटो और विडियो खींच कर. अंग्रेजी में नवजात शिशु के लिए बहुत ही प्यारी बात कही जाती है - Bundle of Joy. हिंदी में ख़ुशी की गठरी कहना कुछ अटपटा सा लगता है. 

मैत्रेय के जन्म के पंद्रह मिनट से आज तक की उसकी पांच साल की विकास यात्रा में आए हर महत्त्व के क्षणों को मैंने अपने कैमरा में कैद कर रखा है. मेरे अपने बचपन की बहुत कम तस्वीरे हैं. उससे ज्यादा मेरे पुत्र और पुत्री की तस्वीरें हैं. लेकिन सबसे ज्यादा मैत्रेय की हैं. मेरा और मेरे बच्चों के जन्म के समय कैमरा में फिल्म का इस्तेमाल होता था जिसे पहले धोना पड़ता था फिर नेगेटिव से पॉजिटिव प्रिंट निकालना पड़ता था. खर्चीला तो था ही, समय भी लगता था. डिजिटल फोटोग्राफी ने सब आसान कर दिया.

मैत्रेय डिजिटल युग की पैदाईश है. इसका उसे और मुझे भरपूर लाभ मिला है. मैंने वे क्षण विडियो रिकॉर्ड किए हैं जब मैत्रेय ने मुंह से पहली बार अं अ ... अं अ की आवाज निकाली. पहली बार लेटे लेटे पलटी मारी,  पेट के बल आगे खिसक कर दूर रखे झुनझुने को पकड़ने की कोशिश की, कई बार लुढ़कने के बाद बैठना सीखा, घुटने के बल चलना शुरू किया, खड़ा होना सीखा और चलना सीखा. 

साल - डेढ़ साल की उम्र में उसे फुटबॉल को किक मारना आ गया.  न जाने फुटबॉल का शौक उसे कहाँ से आया, यह खेल न उसके पिता ने और न दादा ने कभी खेला. 

जब वह छः महीने का था तो मेरा माउथ ऑर्गन उठा लिया और उसमे फूँक कर आवाज निकालने लगा. फिर जब मैं माउथ ऑर्गन पर कोई धुन बजाता था तो उसके साथ घूम घूम कर नाचता था. 

मैत्रेय को बोलना सीखने में औसत बच्चों से थोड़ी देरी हुई. वह शायद इसलिए कि उसे तीन भाषाएँ - हिंदी, गुजराती और नेपाली - सुनने को मिलीं. मेरे घर में हिंदी, पड़ोस में गुजराती और ननिहाल दार्जीलिंग में नेपाली. अब स्कूल में उसे हिंदी और अंग्रेजी पढना लिखना सिखाया जा रहा है. उसकी माँ  एक शिक्षिका है इसलिए होम वर्क कराती है. 

मैत्रेय की डिजिटल जीवन शैली है. पहले मेरा लैपटॉप, फिर मेरा स्मार्ट फ़ोन और अब टेबलेट, उसके सबसे पसंदीदा खिलौने हैं.

अकेले-अकेले छोटा भीम, स्पाइडर मैन, सुपर मैन बन कर खूब उछल कूद करता रहता है. मैंने उसे किसी बात पर जिद्द करते नहीं देखा. 

मैत्रेय ने अपने दादा को सठियाने से बचा लिया है. 

Say 'No' to candles n cake

His pigtail stood up and started wriggling at a feverish pitch. Pandit Choitharam jumped up in ecstasy on reading the four-column news report in the Gujarati daily, Dainik Swadharm."Throw away candle, feed a cow" screamed the headline. He put on his reading glasses to read the full report. 

"Don’t blow out candles on your birthday. It’s “western culture” and needs to be shunned. Instead, wear “swadeshi clothes” this day, do a havan, pray to the ishtadev, feed cows," advises Dinanath Batra, the author of the new textbook for school kids made compulsory for 42,000 schools in Gujarat by the state government. 

"NaMo, Namo ! This is great news. At long last, after almost a thousand years of receiving slavish education, the children of swatantra Bharat will get to learn the greatness of Hindu culture," the pandit ejaculated, throwing a sideways look at his wife. He tied his pigtail into the shape of Omkaara, adjusted his sacred thread to cover the rotund tummy, put on his wooden sandals and walked out. "I must spread the good news among the Brahman samaj," he resolved, heading for the nearest Shiva temple where all the under-employed priests of the locality gathered in search of pious and gullible clients in the hope of getting the contract for performing Satyanarayan Katha.

Ever since the country became an enthusiastic partner of the global culture, this great nation's holiest of holy religion was facing the greatest threat to its very existence. "Need not fear anymore, now that Lord Shiiva, pleased with the chant of "NaMo, Namo", has annointed the Hindu Hriday Samrat as the first authentic Hindi king, India, which has been a Hindu nation only in our dreams, is going to become one in our very own life time," the deputy chief minister of a former colony of  Portugese was reported to have proclaimed in a TV interview. "I am a Christian by birth with a Hindu soul," he declared.

The author of the revolutionary textbook which promises to inculcate patriotism among children suddenly made his appearance on the national educational scene after the higher secondary school pass model-turned-starlet of the idiot box was made the HRD minister by the Hindu Hriday Samrat.  Dinanath Batra, the author, (Disclaimer: Not related by blood or wedlock to the notorious Trichologist Dr Batra who promises to grow rain forest in Sahara desert), had been hiberating all these years in a non-descript Saraswati Vidyalaya of a remote tribal village of the Anandamans. 

Batra's existence and latent talent was discovered by Goondacharya, a self-motivated propagandist, who had given up his illustrious career in politics just for the love of the lady whom the BBC had described as the sexy sanyasin from Khajuraho. Goondaji - that's how thousands of selfless volunteers addressed him - recommened Batra's name to the honorable CM of Gujarat. A former school teacher, Ms. Happiness Petal, desperately needed some kind of magic wand that could transform her image of a puppet doll into that of an iron lady of independent mind befitting her status as the first woman chief minister of Gujarat. 

Batra's textbook proved to be that magic wand. Besides prescribing the ideal recipe and ritual that should be followed during birthday celebrations, the textbook recommends to redraw the map of India as 'Akhand Bharat' to include what stands today as Pakistan, Afghanistan, Nepal, Bangladesh and Myanmar and observe August 14 as "Akhand Bharat Smriti Divas". This has inspired some enterprising coaching classes to introduce classes in cartography. 

Happy days are here again for the likes of Pandit Choitharam and Saraswati Vidya Mandir coaching classes. 

Saturday, July 19, 2014

शुद्ध संस्कृत में गाली

काशी पंडितों की नगरी है. यहाँ की संकरी भूल भुलैया जैसी हर गली में कोई न कोई पंडित टकरा ही जाएगा. कोई संगीत का पंडित, कोई संस्कृत का पंडित तो कोई शेर-ओ-शायरी का पंडित. लेकिन शुद्ध संस्कृत में कर्णप्रिय बनारसी गालियां देने वाला केवल एक ही पंडित है. उनकी विशेषता है कि वे जब संस्कृत में गालियाँ देते हैं तो सामने वाला उसे अपनी तारीफ समझता है. मजे की बात तो यह है कि महाशय लेखक भी हैं और इनके भारी भरकम संस्कृत अपशब्दों की पाठक भूरी भूरी प्रशंसा भी करते हैं. मुझे चूंकि इन अपशब्दों के केवल भोजपुरी पर्याय मालूम है इसलिए चाहकर भी यहाँ महाबंदोपाध्याय विद्वान की समृद्ध भाषा के उदाहरण देने में अक्षम हूँ. 

महामहिम राष्ट्रपति जी से इनकी शक्ल, कद-काठी इतनी तो मिलती है कि भूल से अगर ये कहीं इंडिया गेट के पास मटर गश्ती करते दिख जाएं तो राजधानी के सुरक्षा संगठन में भारी हडकंप मच जाए. दोनों में यूं तो फर्क सिर्फ उतना ही है जितना एक मुखोपाध्याय और बंदोपाध्याय में होता है. महामहिम मुखोपाध्याय हैं तो हमारे संस्कृत छंदों के विद्वान बंदोपाध्याय.

बंदोपाध्याय काशी के उन बंगाली ब्राह्मण परिवारों में से हैं जो सैंकड़ो साल से गंगा किनारे बस गए हैं. यहाँ उनकी अच्छी खासी जजमानी है. स्थानिक बंगाली परिवारों में इनका पूजनीय स्थान है. हर धार्मिक क्रिया कर्म में इनकी सलाह लेना आवश्यक समझा जाता है. किसी बालक का यज्ञोपवित हो, विवाह हो या परिवार में किसी की मृत्यु हो गई हो तो आत्मजनों में सूचना तो शुद्ध संस्कृत मिश्रित बंगला में ही दी जानी चाहिए. अब जब बनारस में बसे ज्यादातर बंगाली भोजपुरी को ही अपनी मातृभाषा मानने लगे हों तो भला शुद्ध संस्कृत में लिखना किसे आए.  मोहल्ले के एकमात्र संस्कृत विद्वान बंदोपाध्याय जी की चिरौरी करनी पड़े. 

पहले तो बंदोपाध्याय जी ऐसे चिरौरिबाज को संस्कृत में प्रेम से खूब गरियाएं और फिर एक राउंड चाय और दो बीड़ा पान ग्रहण करने के बाद प्रसंगोचित निमंत्रण पत्रिका का आलेख लिख दें. जजमान प्रसन्नचित्त हो कर विदा हों. 

उनके पास शुद्ध संस्कृत में गालियों का भण्डार है इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें ठेठ बनारसी गाली देना नहीं आता. मोहल्ले के लुच्चे लफंगों के अलावा छुटभैये नेता और परेता को वे भोजपुरी में ही जम के गरियाते हैं.  ऐसी गाली खाने वाला अपने आप को धन्य महसूस करता है. 

बंदोपाध्याय महोदय विद्यार्थी काल में कट्टर साम्यवादी थे. जनसंघी उनसे बच कर चलते थे. आज भी बच कर चलते हैं. 

व्यंग्य और हास्य के धनी तथा काशी की कला, संस्कृति, धर्म आध्यात्म विषयों पर उनकी पकड़ की वजह से काशी आने वाले पत्रकार, फिल्म कर्मी उन्हें ढूंढ निकालते. बंदोपाध्याय जी उनको अपना ज्ञान देते. 

उनकी ख्याती उड़ते उड़ते सरहद पार भी पहुंची. उनका पता लगाने ढाका से कलकत्ता फ़ोन गया. दीदी ने बेगम को उनका पता बताया. बेगम ने बनारस आना की योजना बनायी. आखिरी समय किसी अत्यावश्यक कारणों से यात्रा मुल्तवी रखनी पड़ी. बात फैल गई. बंग समाज में बंदोपाध्याय का रुतबा और भी बढ़ गया. बंग समाज ने बंदोपाध्याय महोदय के सार्वजनिक सम्मान का भव्य आयोजन किया. संयोग से मैं भी उस आयोजन में उपस्थित था. उनके सम्मान में जो प्रशस्तिपत्र पढ़ा गया उसे सुन कर मैं अचम्भे में पड गया. वह बंगला कम संस्कृत ज्यादा लग रहा था. 

"का गुरु, इतना बढ़िया बंगला के लिखा?" मैंने आखिर उनसे पूछ ही लिया. 

"बकलोल, हम ही लिख देहली. और के लिखी", महाबंदोपाध्याय  मुंह में पान घुलाते हुए बोले. 

Wednesday, July 16, 2014

Mad Pratap Manic's Diplomatic Mission

By Nachiketa Desai

Mad Pratap Manic was in deep sleep enconsed in a bed next to Baba Kamdev. He was dead tired after a two-hour Bhoga Aasan the salwar-clad Yoga Guru had forced him to practice at Godhuli Bela, the auspicious time when herds of cows hoofed up dust while crossing into Bangladesh to rest in peace in the comforts of the five-star abattoir on the outskirts of Dhaka. 

At the stroke of midnight, Maddie's (all PMs and PMs in waiting called Mad Pratap endearingly as Maddie) unlisted satellite phone beeped two and a half times. "Oh, this must be from the HQ. This is generally the time when the chief calls after concluding Pentagon's emergency meetings," Maddie whispered into Kamdev's right ear. 

Kamdev gave a wicked smile, winked his normal eye and whispered back, "The chief's omnipresent spy camera must have already captured us practising Bhoga Aasan. Feel free to use the cellar to take the call."

Maddie scampered to the cellar. "Yes chief ! Shoot," he spoke into the mouthpiece while standing in attention, the right hand half raised in salute in the exact manner that all Sangh's rank and file were taught in the shakha. 

"Wake up you ass, whole civilized world is screaming at us over the mess we have created in Palestine and Iraq. Having slaughtered  hundreds of women and children, the Zionists now want to push for the 'Final Solution'. We will handle the Israelis, don't you worry. You rush to Lahore where we have setup your rendezvous with Half Ease, our man there. We have promoted him to your rank so that you don't have to feel belittled in breaking bread with him," the chief told Maddie in an ominous, menacing tone. 

"But, Sir, what about the Fuhrer and his gang of Himmlers, Goebels and Goerings? Would they approve of the glamorous assigment you are giving me? As it is I can sense a tinge of jealously towards me in their eyes," Maddie mumbled. 

"Fuhrer is offshore playing Bric-Brac. The others have no say in the matter. Moreover, Motabhai can be relied upon to manage the Himmlers, Goebels and Goerings, all together and at one go.  It has been long since he organized a rave party on the top-floor of his  75-storey, 400,000-square-foot skyscraper home in Mohamaya nagari, " the chief assured Maddie.

Molly cuddled thus by the chief, Maddie returned to the master bedroom where, to his surprise, Baba Kamdev was alrady practicing Bhoga Aasana in changed pair of Salwars.

Maddie put on his favourite journalistic jacket, discarding the academic one, and set off for his rendezvous with Half Ease. 

The rest is 'His' story.

Friday, July 04, 2014

Cyprus Resettlement Project

I was a member of an international peace initiative called 'Cyprus Resettlement Project' in 1972. The project envisaged restoring harmony between Greeks and Turks in Cyprus and resettling refugees from both the communities in the villages they were forced to abandon following large-scale communal violence immediately after the island nation gained independence from the British. 

The Island nation of Cyprus had a population of over 600,000 and the size of a medium Indian district - 180 km long and 80 km wide. The population of Greek, who are orthodox Christians, was nearly 80 per cent while the Muslim Turks were 15 per cent, similar to the demography of India, in a way.

Both the communities looked at each other with suspicion though they inter-mingled during the day and would retire to their respective quarters at night. Every village had at least one Cafe where men would drink endless cups of black coffee and play cards and checkers.

The Turks knew Greek, but the Greek did not know Turkish. Like any majority community in the world, the Greeks could afford to be liberal, while the Turks were a closed community.

Being in my early 20s, I befriended the youth of my age, spending my time in Cafes and playing chess with them. On weekends, we would go out on picnic with both Greek and Turk young men and women.

During our stay in Cyprus, not a single incident of communal tension and violence was reported from any corner of the country. Our team had managed to convince members of both the communities to accept the refugees to come back to their own villages. A list of such refugees was prepared in consultation with the villagers.

However, we had to wind up our project all of sudden when the regular army from Turkey, which is just about 30 - 40 nautical miles across the Mediterranean sea, invaded the island and occupied half of it.
There was also an extremist orthodox Greek group which wanted Cyprus to be made a part of mainland Greece. But, Greece was several hundred nautical miles away from Cyprus.

Left to themselves, without the intervention and interference of political leaders and extremists, the Greeks and the Turks would have lived happily like good neighbors.

Wednesday, July 02, 2014

भाषाओं की गड्ड मड्ड

आठ साल तक मेरा बचपन ओडीशा और गुजरात के वेडछी गांव, बारडोली (जो उस समय गांव ही था) और वडोदरा में बीता. 

कटक में जन्म हुआ इसलिए स्वाभाविक रूप से ओडीआ मेरी पहली भाषा बनी. दूसरी भाषा गुजराती. तीसरे दर्जे तक गुजराती माध्यम से पढ़ाई की. ओडीआ पढना बहुत बाद में सीखा (मेरी एक सखी मुझे ओडीआ में पत्र लिखा करती थी जिसे पढ़्ने के लिए मां के पास ओडीआ और हिन्दी की वर्णमाला लिखवा ली थी  ) .

बचपन में भाषा को लेकर बहुत गड्ड-मड्ड होता था. हम जब गुजरात से ओडीशा जाते थे तो कुछ दिन लग जाते थे गुजराती भूल कर ओडीआ बोलने में. कई शब्द ओडीआ और गुजराती मिला कर बोलते थे. जिस कारण मेरे ओडीया मित्र हंसते थे. वैसा ही तब होता था जब हम गुजरात वापस आते थे. बीच में ओडीशा से कलकत्ता और शांतिनिकेतन भी जाना होता था. तब ओडिआ भूल कर बंग्ला बोलने लगते थे.

भुवनेश्वर में नाना के पास रहते थे तो मुख्यमंत्री के आवास में कार्यरत खानसामा, माली, ड्राइवर और पुलिस के सिपाहियों से ठेठ गांव की उडीआ में बात होती थी. इसलिए उडिया गालियां सीख लीं. गुजरात के वेडछी गांव में मेरे दोस्त वहां की आदिवासी भाषा चौधरी बोलते थे. चौधरी बोली में कई कहावतें और गीत सीखे थे, जो अब भूल गया हूं.

जब गांव छोड़ कर वडोदरा शहर आए तो स्कूल में बच्चे मेरा खूब मजाक उडाते थे क्यों कि मेरी भाषा और कपड़े-लत्ते देहाती थे. मेरी क्लास के लड़के लड़कियां चप्पल पहन कर आते थे. मुझे चप्पल पहनने की आदत नहीं थी. कई चप्पल खो दी. एक बार गांव से सीखी गाली बोलने पर शिक्षक से डांट भी खाई.

वडोदरा छोड़ कर हम १९६० में बनारस आ गए. वहां स्कूल में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में पढाई होती थी. मुझे तो सिर्फ़ गुजराती आती थी. दो साल पीछे के क्लास में धकेल दिया गया. गर्मी की छुट्टियों में मां ने हिन्दी और अंग्रेजी पढाई. अगले साल एक साल आगे के क्लास में ले लिया गया. फिर भी एक साल का नुकसान हो ही गया.

मेरी स्कूल में अमीर घर के बच्चे पढ़ते थे. अच्छे कपड़े-जूते पहनते थे. हम खादी के कपड़े पहनते थे. हीन भावना हर समय कचोटती रहती थी. बहुत बाद में जब पढाई लिखाई में मेरे नम्बर अच्छे आने लगे तब जा कर मेरा स्वमान बढ़ा.

बाबाजी भाई

बलभद्र मिश्र ओडीशा में नानी मालती देवी चौधुरी के सहयोगी हुआ करते थे. सब उन्हें बाबाजी भाई कह कर बुलाते थे. गणेश जी की तरह गोल तोंद, तोंद पर मोटी जनेऊ, खुला बदन, मुंह में पान, ब्रह्मचारी. अनुगुल के पास ही गांव के थे. नानी के साथ आजादी के आन्दोलन के समय से ही सहकर्मी रहे. आजादी के बाद नानी के आश्रम में व्यवस्था देखते थे. आश्रम के बच्चे उन्हें बहुत चाहते थे. रामायण और महाभारत के अलावा मन गढंत शेर और भालू की कहानियां सुनाने का शौक. बच्चे कहानी के लिए जिद करते. वह सुनाते और कभी न थकते. चुस्त ब्राहमण की तरह टीका, पूजा-पाठ करते मगर छुआ-छूत में नहीं मानते. 

बांग्लादेश के शरणार्थी और तरुण शांति सेना

बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम (१९७१) के समय तरुण शांति सेना ने कई शरणार्थी शिविरों में राहत, सफाई और स्वास्थ्य सेवाएं देने का काम किया था. मेरी बड़ी बहन संघमित्रा उस समय कलकत्ता की नील रतन सरकार मेडिकल कोलेज में पढ रही थी और ओक्सफ़ाम के साथ मिल कर शरणार्थियों के बीच काम कर रही थी. जयप्रकाश नारायण के निर्देश में पिताजी बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के लिए विश्व जनमत हेतु पदयात्रा आयोजित कर रहे थे.
पाकिस्तान सेना बांग्लादेश में जन संहार, बलात्कार और लूट मार कर रही थी. भयाक्रांत लोग करोड़ों की तादाद में अपना घर द्वार छोड़ कर भारत की शरण में आ रहे थे. उनके लिए जगह-जगह राहत शिविर खोले गए थे जहां उन्हें खाना और चिकित्सा सुविधाएं दी जा रही थीं. मैं तरुण शांति सेना के साथियों के साथ सिलीगुड़ी से १५-२० किलो मीटर दक्षिण, बांग्लादेश की सीमा से ५ कि.मी. उत्तर एक शरणार्थी शिविर में राहत कार्य कर रहा था.
शिविर में पचास हजार के करीब शरणार्थी थे. ज्यादातर बूढे, महिलाएं और बच्चे. कुछ जवान भी थे. शिविर में सबसे बड़ी समस्या थी सफाई की. लोग अपने अपने तम्बू के आस-पास ही शौच-पेशाब करते थे. चारों तरफ दुर्गंध और मक्खियों की भिनभिनाहट. भयंकर दुर्गंध से बचने के लिए मुंह पर रूमाल बांधना पड़ता था.
चावल, दाल, चीनी, चाय की पत्ती, कपड़ों के लिए शरणार्थियों में झगड़े होते थे. जवान और दबंग लोग जरूरतमंद लोगों तक राहत सामग्री पहुंचने नहीं देते थे, बीच में ही कब्जा कर लेते थे. हमें इस लूट को रोकने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी. कई बार कठोर कदम भी उठाने पड़ते थे.
युवाओं को शिस्तबद्ध करने के ईरादे से मैंने एक नियम जारी किया. रोज सुबह हमारी कैम्प ओफिस के पास के मैदान में उनकी परेड करानी शुरू की. रोज सुबह हाजिरी ली जाती थी. परेड करवाया जाता था और उनसे बांग्लादेश का राष्ट्रगीत "आमार सोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालो बासी" गवाया जाता था. जो गैर हाजिर रहता उसे उस दिन का राशन नहीं मिलता.
कैम्प में सफाई की गंभीर समस्या थी. लोग कैम्प के बाहर बनाए गए ट्रेन्च लैटरीन का इस्तेमाल न कर बाहर, खुले में ही शौच करते. हमने उन्हें शर्मिन्दा करने के लिए खुद फावड़ा, झाडू और बाल्टी ले कर जहां कहीं मल दिखाई दे उसे उठाना चालू कर दिया. इसका बिजली की तरह असर हुआ. दो-तीन दिन में लोगों ने बाहर खुले में शौच करना बंद कर दिया.
मेरे मामा समरेन्द्र नाथ महान्ती पास में बागडोगरा वायु सेना स्टेशन के कमांडिंग अफसर थे. एक बार उनकी सिफारिश से सेना की जीप से हम बांग्लादेश की सीमा के उस पार करीब २० कि.मी. अंदर गए. भारतीय सेना के साथ बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी के जवान पाकिस्तान की सेना से लड़ रहे थे. उनकी छावनी में कुछ घंटे बिता कर हम वापिस अपने शिविर आ गए.
रोज रात को हमारे शिविर में तोप के गोलों के फटने की आवाज सुनाई देती थी. हमारी वायुसेना के बम वर्षक विमान उडते सुनाई देते थे. बडे रोमांचक दिन थे.
पिछले साल सितम्बर में मुझे बांग्लादेश जाने का मौका मिला. कलकत्ता से ढाका बस से और ढाका से चिटागोंग कार से यात्रा की. चारों तरफ़ हरियाली, नदी और तालाब देख कर मन खुश हो गया. बांग्लादेश में वाहन सी.एन.जी गैस से चलते हैं, इसलिए प्रदूषण बहुत कम है. नदियों में नाव और जहाज से काफ़ी यातायात होता है.
मेरी नानी का ननिहाल ढाका के पास बिक्रमपुर है. समय और धन की कमी से जा न सका. अगली बार जब भी बांग्लादेश जाने का मौका मिलेगा तो बिक्रमपुर जरूर जाऊंगा.

Wednesday, June 18, 2014

मेरी नानी

मेरी नानी मालती देवी चौधुरी शेरनी थी. उडीसा के गरीब आदिवासी उन्हें "मां" कहकर बुलाते थे. उन्होंने उडीसा में जन आंदोलन चला कर गुती प्रथा को समाप्त करवाया. गुती प्रथा के तहत गरीब आदिवासी साहूकारों की पीढी दर पीढी गुलामी करने को मजबूर थे. मेरे नाना उडीसा के मुख्यमंत्री थे और नानी आदिवासियों की नेता. 

एक बार आंदोलनकारी आदिवासी हजारों की संख्या में तीर-क्मान ले कर जंगल में निकल पड़े. सामने बन्दूकों से लैस पुलिस उन्हें रोकने आई. वातावरण तंग हो गया. कभी भी तीर और गोली चल सकती थी. नानी उसी इलाके में गांव-गांव पैदल घूम रही थी. उन्हें खबर लगी तो घटना स्थल पर पहुंच गई. आदिवासियों और पुलिस के बीच दीवार बन के खड़ी हो गई. आदिवासियों की मां को, जो मुख्यमंत्री की पत्नी भी थी, आदिवासियों के बीच से निकल कर आगे बढते देख, पुलिस सकते में आ गयी और वापस लौट गई.

भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उन्हें जेल हुई. १९४६ में जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपने गहने बेच कर अनुगुल में जमीन खरीदी और वहां आदिवासी और दलित बच्चों के लिए आश्रम विद्यालय खोला. बच्चे और शिक्षक खेती और खादी के काम के साथ पढाई करते. वहां से पढे छात्र-छात्राएं आगे चल कर शिक्षक और समाज सेवक बने.

एक बार जब मैं पांचवी या छठवीं कक्षा में पढता था तो गर्मियों की छुट्टी में बनारस से नानी के पास जाने के लिए निकला. कलकत्ता से भुवनेश्वर तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजु पटनायक के साथ उनके निजी हवाई जहाज से आया. हवाई यात्रा का मेरा यह पहला अनुभव था. बीजु पटनायक ने, जो खुद पायलट रह चुके थे, मुझे सह पायलट की सीट पर बैठाया और स्वयं पायलट की जगह ले ली और मुझे हवाई जहाज को ऊपर-नीचे, दाएं-बांए कैसे घूमाते हैं यह दिखाया.

भुवनेश्वर पहुंच कर मुझे अपने ड्राइवर के साथ न्यू मार्केट भेजा जहां से मुझे मेरी मन पसंद के दो खिलौने - एक चाबी से चलने वाला बन्दर और दूसरा बैटरी से चलने वाली खिलौने की पिस्तौल जिसमें से आवाज के साथ-साथ रंग बिरंगी रोशनी निकलती थी.

जब मैं नानी के आश्रम अनुगुल पहुंचा तो मेरे खिलौने देख कर वे गुस्से से आग बबूला हो गईं. "इतने रुपये से तो मेरे दो बच्चों के लिए महिने भर का खाना आ सकता है. तुम कैसे इतने मंहंगे खिलौने से खेल सकते हो?"

विरोध में नानी ने एक दिन खाना नहीं खाया. मैं बहुत गुस्सा हुआ और रोया. बाद में मुझे नानी के उस दिन के व्यवहार का मतलब समझ में आया और आदिवासी बच्चों के सामने मैं ने जो खिलौनों का गर्व के साथ प्रदर्शन किया था उस पर भारी शर्म महसूस हुई.

काशी कथा

काशी स्टेशन के पास दो मोहल्ले हैं. राजघाट और प्रह्लादघाट. आठ साल से अठ्ठाईस साल की उम्र तक मैं यहीं पला-बढा. खेला-कूदा, गंगा और वरुणा नदी में तैरा. हम उम्र दोस्तों के साथ मार-पीट भी की. वरुणा और गंगा के संगम पर बसे राजघाट बेसन्ट स्कूल में दूसरे दर्जे से ग्यारहवीं तक पढ़ा.
प्रह्लादघाट के कई पंडा-पुरोहित मेरे दोस्त थे. उन्हें बचपन से ही जजमानी संभालना सिखाया जाता था. जिनके कोई खानदानी पंडे-पुरोहित नहीं होते थे ऐसे काशी यात्रियों को ट्रेन से उतरते ही जजमान बनाने की होड़ लगती थी. क्रिया-कर्म के सभी चोंचले उन्हें जन्म घुट्टी के साथ ही पिलाई गई थी.
मुन्नु गुरु, रामा गुरु, चुनमुन गुरु, ढुलमुल गुरु - सब के सब गुरु. तीसरी चौथी तक के पढे. अखबार पढ़ भर लेते थे, वेद पुराण से दूर का भी नाता नहीं. हां, कर्म-कान्ड से संबंधित श्लोक और मंत्र, अगड़म-बगड़म ऐसे बोलते थे जैसे इनका अर्थ और महत्व सिर्फ़ उन्हीं को पता है. जजमान चुंधिया जाते थे और खुशी-खुशी अपनी गांठ ढीली कर देते थे.
पंडों के बीच जजमानी के इलाके बंटे हुए थे. किसी के हिस्से सरगूजा तो किसी के भाग में उड़ीसा. जजमानी की ’जमीनदारी’ को लेकर आपस में कोई झगड़ा नहीं. साठ के दशक तक प्रह्लादघाट के सभी पंडे दशास्वमेध घाट और विश्वनाथ गली के पंडों को जजमान से मिले दान का चवन्नी हिस्सा दिया करते थे. पंडों के राजा हुआ करते थे अंजनीनंदन मिश्र.
प्रह्लादघाट के पंडों ने अपनी यूनियन बना ली और मेरे स्कूल के सहपाठी निशिराज मिश्र के पिता नेता चुने गए. एक दिन सारे पंडों ने फैसला किया कि कोई भी अब दशास्वमेध घाट और विश्वनाथ गली के पंडों को चवन्नी हिस्सा नहीं देगा.
इस बगावत को दबाने का जिम्मा अंजनीनंदन मिश्र को सौंपा गया. एक दिन प्रह्लादघाट की मुख्य सड़क पर एक पान की दुकान के सामने निशिराज मिश्र के पिता की गोली मार कर हत्या कर दी गई. दिन दहाड़े की गई हत्या के बावजूद प्रह्लादघाट के पंडे डरे नहीं, झुके नहीं. समयान्तर में जजमानी से मिलने वाली आमदनी धीरे-धीरे कम होती गई. पुरोहित परिवारों की नई पीढी स्कूल कालेज जाने लगी, नौकरी पेशा करने लगी.
मेरे हम उम्र पंडे, बचपन के साथी, कई तो स्वर्ग सिधार गए और बाकी अपनी-अपनी गद्दी पर चिलम खींच खीच कर समय काट रहे हैं.
काशी की कई कहानियां हैं. फुर्सद और मूड़ बनने पर लिखूंगा.